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"दोगुने फल" का योग — कार्यों का दोगुना परिणाम
द्विपुष्कर योग (संस्कृत: द्विपुष्करयोग, "दो कमल") एक विशेष मुहूर्त योग है जहां किसी भी कार्य के परिणाम — सकारात्मक या नकारात्मक — दोगुने माने जाते हैं। अधिकांश शुभ योगों के विपरीत, द्विपुष्कर एक तटस्थ प्रवर्धक है: अच्छे कार्य दोगुना पुण्य देते हैं, लेकिन नकारात्मक कार्य भी दोगुने परिणाम लाते हैं।
द्विपुष्कर योग के लिए तीनों शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए:
तिथि: द्वितीया (2), सप्तमी (7), या द्वादशी (12) — शुक्ल या कृष्ण पक्ष में
नक्षत्र: मृगशिरा (5), चित्रा (14), या धनिष्ठा (23)
वार: रविवार (0), मंगलवार (2), या शनिवार (6)
तीनों नक्षत्र एक समान सूत्र साझा करते हैं — प्रत्येक अपने 9 नक्षत्रों के समूह में 5वां है। तिथि 2, 7, 12 ठीक 5 के अंतर पर हैं। "पाँच" का यह गणितीय प्रतिरूप योग का संरचनात्मक आधार है।
द्विपुष्कर योग सभी परिणामों को बढ़ाता है, केवल सकारात्मक नहीं:
द्विपुष्कर योग लगभग महीने में 2-3 बार होता है। तीन तिथियाँ (2, 7, 12) प्रत्येक चंद्र मास में दो बार आती हैं, इन्हें 3 नक्षत्रों और 3 वारों के साथ संरेखित होना चाहिए।