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भारत की खगोलीय विरासत का विज्ञान
सूर्य सिद्धान्त (लगभग 400 ई.) मानव इतिहास के सबसे उल्लेखनीय खगोलीय ग्रन्थों में से एक है। यह नाक्षत्र वर्ष की गणना 365.2563627 दिनों पर करता है — जो आधुनिक मान के आश्चर्यजनक रूप से निकट है।
आर्यभट (476 ई.) ने प्रस्तावित किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है — कॉपरनिकस से एक सहस्राब्दी पहले।
पञ्चाङ्ग ("पाँच अंग") एक चान्द्र-सौर कालदर्शिका है जो प्रतिदिन पाँच खगोलीय तत्वों को ट्रैक करती है।
भारतीय खगोल विज्ञान अयनांश के माध्यम से विषुव अयन गति का हिसाब रखता है।
भारतीय खगोलविदों ने राहु-केतु को चन्द्रमा की कक्षा के पात बिन्दुओं के रूप में पहचाना।