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होली से पूर्व 8 अशुभ दिन
होलाष्टक प्रत्येक वर्ष होली से पहले 8 अशुभ दिनों की अवधि है। यह फाल्गुन शुक्ल अष्टमी (फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष का 8वां दिन) से फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा (पूर्ण चन्द्र दिवस, जो होली है) तक चलती है। यह शब्द "होला" (होली) + "अष्टक" (आठ) से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ "होली के आठ दिन" है।
होलाष्टक नाम दो संस्कृत-मूल शब्दों से मिलकर बना है: "होला" "होलिका" (होली की पूर्व संध्या पर जलाई जाने वाली राक्षसी) से निकला है, और "अष्टक" का अर्थ "आठ का समूह" है। ये 8 दिन तैयारी की अवधि माने जाते हैं जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा होलिका दहन की चरमोत्कर्ष की ओर बढ़ती है।
होलाष्टक के दौरान ग्रह आक्रामक या अस्थिर स्थिति में माने जाते हैं। होलिका दहन की ओर अग्नि ऊर्जा का संचय एक ऐसा वातावरण बनाता है जहाँ नई शुरुआत करना जोखिमपूर्ण माना जाता है।
दिन 1 — अष्टमी: अशुभ अवधि की शुरुआत। संयम की ऊर्जा शुरू होती है।
दिन 2 — नवमी: तीव्रता बढ़ती है। कोई नया उद्यम शुरू नहीं करना चाहिए।
दिन 3 — दशमी: प्रतिबंध गहरा होता है। मौजूदा प्रतिबद्धताओं पर ध्यान दें।
दिन 4 — एकादशी: स्वयं एक उपवास दिवस। आध्यात्मिक साधना पर ज़ोर।
दिन 5 — द्वादशी: अशुभ अवधि के बावजूद होली की तैयारी शुरू होती है।
दिन 6 — त्रयोदशी: उपान्त्य चरण। होलिका दहन की तैयारी के लिए सामुदायिक जुटान।
दिन 7 — चतुर्दशी: होलिका दहन की पूर्व संध्या। चिता को जोड़ा जाता है।
दिन 8 — पूर्णिमा: रात को होलिका दहन, अगली सुबह रंगों का त्योहार। होलाष्टक समाप्त।
होलाष्टक का 8वां और अंतिम दिन स्वयं होली है — रंगों का त्योहार जो भक्ति की बुराई पर विजय का उत्सव है। होली की पूर्व संध्या (होलिका दहन) पर अलाव जलाया जाता है जो राक्षसी होलिका के दहन का प्रतीक है। माना जाता है कि यह अग्नि होलाष्टक काल की सभी संचित नकारात्मक ऊर्जा को भस्म कर देती है।
होलाष्टक को हिन्दू पंचांग में तीन मानदंडों से पहचाना जा सकता है: (1) मास फाल्गुन होना चाहिए (अमान्त गणना), (2) पक्ष शुक्ल होना चाहिए, (3) तिथि अष्टमी (8वीं) से पूर्णिमा (15वीं) के बीच होनी चाहिए।
होलाष्टक मुख्य रूप से उत्तर और मध्य भारत में मनाया जाता है, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात के कुछ भागों में। दक्षिण भारत में होलाष्टक की अवधारणा बहुत कम प्रमुख है।