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रक्षा बन्धन श्रावण पूर्णिमा को अपराह्न (दोपहर बाद) में किया जाता है। भद्रा काल से सख्ती से बचना चाहिए — भद्रा में राखी बाँधना अशुभ होता है। भद्रा का समय पंचांग से देखें और उससे पूर्णतः बचें।
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बहन आरती की थाली में जलता दीपक, रोली, अक्षत, मिश्री, एक फूल और राखी सजाती है। भाई और बहन दोनों स्नान करके स्वच्छ शुभ वस्त्र पहनें।
बहन जलते दीपक की थाली को भाई के चेहरे के चारों ओर तीन बार दक्षिणावर्त घुमाकर उनकी आरती करती है।
बहन अनामिका से भाई के माथे पर रोली का तिलक लगाती है, फिर तिलक पर अक्षत (चावल के दाने) चिपकाती है। यह शुभ आशीर्वाद का प्रतीक है।
बहन रक्षा सूत्र मन्त्र पढ़ते हुए भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बाँधती है। भाई अपनी हथेली खुली और ऊपर की ओर रखते हैं। यह रक्षा बन्धन का मूल अनुष्ठान है।
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
yena baddho balī rājā dānavendro mahābalaḥ | tena tvāmanubadhnāmi rakṣe mā cala mā cala ||
जिस बन्धन से महाबली दानवराज बलि बाँधे गए थे, उसी बन्धन से मैं तुम्हें बाँधती हूँ। हे रक्षा, डिगो मत, डिगो मत!
बहन भाई को मिश्री या मिठाई खिलाती है, और भाई भी बहन को मिठाई खिलाता है। इससे बन्धन मधुर होता है।
भाई बहन को उपहार (परम्परागत रूप से धन या सोना) देता है और जीवनभर उसकी रक्षा का वचन देता है। वह आशीर्वाद स्वरूप उसके पैर या सिर छूता है।
परिवार मिलकर मिठाई बाँटता है और उत्सव मनाता है। पड़ोसियों और रिश्तेदारों को मिठाई बाँटें।
भाई और बहन दोनों मिलकर एक-दूसरे के कल्याण, दीर्घायु और सुख की प्रार्थना करते हैं। बहन भाई की रक्षा की प्रार्थना करती है; भाई बहन की समृद्धि की प्रार्थना करता है।