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पूजा सायंकाल पूर्ण चन्द्रमा के दर्शन के बाद की जाती है। चन्द्रोदय होते ही चन्द्र अर्घ्य (चन्द्रमा को जल अर्पण) दिया जाता है। सत्यनारायण कथा, यदि की जाती है, तो प्रदोष काल (सायंकालीन अवधि) में की जाती है।
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प्रातःकाल उठें, स्नान करें और पूर्णिमा व्रत का संकल्प लें। उपवास आरम्भ करें — निर्जला (बिना जल), फलाहारी (केवल फल), या एकभुक्त (एक भोजन)। स्वच्छ सफ़ेद या हल्के रंग के वस्त्र पहनें। यदि सम्भव हो तो मन्दिर जाएँ।
सफ़ेद कपड़े से पूजा स्थल सजाएँ। भगवान विष्णु का चित्र रखें। चन्दन, फूल, अक्षत और अगरबत्ती से षोडशोपचार पूजा (16 चरणों की पूजा) करें। घी का दीपक जलाएँ। विष्णु सहस्रनाम या ॐ नमो नारायणाय का जप करें।
बहुत से परिवार पूर्णिमा पर सत्यनारायण पूजा और कथा करते हैं। सत्यनारायण कथा के पाँच अध्याय पढ़ें या सुनें, जिनमें भक्तों की कहानियाँ हैं जिनकी मनोकामनाएँ भगवान विष्णु की सच्ची भक्ति से पूर्ण हुईं।
सायंकाल बाहर जाएँ और पूर्ण चन्द्रमा के दर्शन करें। ताम्बे के पात्र में जल भरें, दूध, अक्षत, सफ़ेद फूल और चन्दन डालें। चन्द्रमा की ओर मुख करके चन्द्र मन्त्रों का जाप करते हुए अर्घ्य (जल मिश्रण) अर्पित करें। यह पूर्णिमा व्रत का मुख्य अनुष्ठान है।
अर्घ्य के बाद चाँदनी में बैठकर ध्यान करें। पूर्ण चन्द्रमा के शीतल, श्वेत प्रकाश की कल्पना करें जो आपके शरीर को शान्ति और स्थिरता से भर रहा है। मानसिक शान्ति, भावनात्मक सन्तुलन और समस्त क्रोध एवं अशान्ति के शमन की प्रार्थना करें। वैदिक ज्योतिष में चन्द्रमा मन (मानस) का शासक है।
चन्द्र अर्घ्य और पूजा के बाद खीर (दूध-चावल) — पूर्णिमा का मुख्य नैवेद्य — से व्रत तोड़ें। परिवार के साथ प्रसाद बाँटें। ज़रूरतमन्दों को भोजन, वस्त्र या दान वितरित करें। चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत पूर्ण माना जाता है।