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फाल्गुन पूर्णिमा पर प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का सन्ध्याकाल) होलिका दहन का शुभ समय है
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गोबर के उपले, लकड़ी के लट्ठे और सूखी टहनियाँ इकट्ठी करें। खुले मैदान में चिता बनाएँ, बीच में एक लकड़ी का खम्भा रखें जो प्रह्लाद का प्रतीक है। चिता के चारों ओर कच्चा सूती धागा लपेटें।
चिता के पास जल का लोटा रखें। थाली में कुमकुम, अक्षत, फूल, नारियल और अन्य सामग्री सजाएँ।
दाहिने हाथ में जल और अक्षत लेकर, तिथि, स्थान और होलिका दहन का उद्देश्य बोलकर जल छोड़ें।
होलिका चिता की 3, 5 या 7 बार दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) परिक्रमा करें, लोटे से निरन्तर जल की धारा डालते हुए। चिता पर कुमकुम लगाएँ और अक्षत चढ़ाएँ।
भगवान नरसिंह से रक्षा की प्रार्थना करते हुए चिता पर फूलों की माला चढ़ाएँ, प्रह्लाद की अटूट भक्ति की कथा का स्मरण करें।
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्योर्मृत्युं नमाम्यहम्॥
oṃ ugraṃ vīraṃ mahāviṣṇuṃ jvalantaṃ sarvatomukham | nṛsiṃhaṃ bhīṣaṇaṃ bhadraṃ mṛtyormṛtyuṃ namāmyaham ||
मैं भगवान नरसिंह को प्रणाम करता हूँ, जो उग्र, वीर, महाविष्णु, सर्वत्र ज्वलन्त, भयंकर फिर भी मंगलकारी — मृत्यु की भी मृत्यु हैं।
शुभ प्रदोष मुहूर्त में चिता प्रज्वलित करें। जैसे-जैसे अग्नि ऊपर उठे, नरसिंह मन्त्र और होलिका दहन मन्त्र का जप करें। अग्नि अशुभ के दहन और सत्य की विजय का प्रतीक है।
असृक्पाभयसन्त्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः। अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव॥
asṛkpābhayasantrastaiḥ kṛtā tvaṃ holi bāliśaiḥ | atastvaṃ pūjayiṣyāmi bhūte bhūtipradā bhava ||
हे होलिका, रक्तपान करने वाले राक्षसों से भयभीत बच्चों (भक्तों) ने तुम्हें रचा। इसलिए मैं तुम्हारी पूजा करता हूँ — हे भूत, हमें समृद्धि प्रदान करो।
पवित्र अग्नि में नई फसल के अन्न — गेहूँ, जौ, भुने चने — और साबुत नारियल अर्पित करें। ये ऋतु की पहली उपज का देवार्पण हैं।
हाथ जोड़कर भगवान नरसिंह और प्रह्लाद से प्रार्थना करें: "जैसे प्रह्लाद अपनी भक्ति से सुरक्षित रहे, वैसे ही सभी भक्तों की अशुभ से रक्षा हो।" प्रह्लाद प्रार्थना पढ़ें।
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वैष्णवज्वराय। महाज्वालाय सर्वरक्षोघ्नाय सर्वभूतरक्षोघ्नाय। सर्वज्वरघ्नाय दह दह पच पच नाशय नाशय हुं फट् स्वाहा॥
oṃ namo bhagavate mahāsudarśanāya vaiṣṇavajvarāya | mahājvālāya sarvarakṣoghnāya sarvabhūtarakṣoghnāya | sarvajvaraghnāya daha daha paca paca nāśaya nāśaya huṃ phaṭ svāhā ||
महासुदर्शन (भगवान विष्णु के चक्र) को नमन, वैष्णव ज्वर, महाज्वाला, सभी राक्षसों के संहारक, सभी भूत-प्रेतों के नाशक, सभी ज्वरों के नाशक — दहन करो, पचा दो, नष्ट करो — हुं फट् स्वाहा!
जब अग्नि शान्त हो जाए, अंगारों में नई फसल के दाने (गेहूँ की बालियाँ, जौ) भूनें। ये भुने दाने प्रसाद के रूप में परिवार और पड़ोसियों में बाँटें।
घी के दीपक से होलिका अग्नि की आरती करें। "आरती कुंज बिहारी की" गाएँ — भगवान कृष्ण की आरती, होली की दिव्य लीला का उत्सव।
उपस्थित सभी लोगों में गुजिया, मिठाई और भुने दानों का प्रसाद बाँटें। रक्षा हेतु होलिका अग्नि की पवित्र भस्म (विभूति) माथे पर लगाएँ।
अगली सुबह (धुलण्डी / रंग पंचमी): एक-दूसरे को गुलाल और प्राकृतिक रंग लगाएँ, नाचें, वृन्दावन में कृष्ण की गोपियों के साथ लीला का स्मरण करते हुए होली गीत गाएँ। पिचकारी और रंगीन पानी का प्रयोग करें।