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भगवान विष्णु (प्रह्लाद के रक्षक)
दैत्य राजा हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को विष्णु की भक्ति के लिए मारने का प्रयास किया। उसकी बहन होलिका, जिसे अग्नि से प्रतिरक्षा का वरदान था, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी। पर वरदान केवल अकेले बैठने पर काम करता था — होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया।
अच्छाई (प्रह्लाद की भक्ति) की बुराई (हिरण्यकशिपु के अहंकार) पर विजय। वसन्त, नवीनता और सामाजिक एकता का उत्सव।
पूर्व संध्या: होलिका दहन — अलाव जलाएँ, परिक्रमा करें। अगले दिन: रंगों से खेलें (गुलाल, पिचकारी), ठण्डाई पिएँ, गुजिया खाएँ। मित्रों और परिवार से मिलें।
फाल्गुन पूर्णिमा पर प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का सन्ध्याकाल) होलिका दहन का शुभ समय है
इस शुभ फाल्गुन पूर्णिमा पर, समस्त अशुभ के विनाश, नकारात्मकता से रक्षा, और भक्ति (प्रह्लाद) की आसुरी शक्तियों (होलिका) पर विजय के उत्सव हेतु, भगवान नरसिंह की कृपा से, मैं यह होलिका दहन पूजा करता/करती हूँ।
गोबर के उपले, लकड़ी के लट्ठे और सूखी टहनियाँ इकट्ठी करें। खुले मैदान में चिता बनाएँ, बीच में एक लकड़ी का खम्भा रखें जो प्रह्लाद का प्रतीक है। चिता के चारों ओर कच्चा सूती धागा लपेटें।
चिता के पास जल का लोटा रखें। थाली में कुमकुम, अक्षत, फूल, नारियल और अन्य सामग्री सजाएँ।
दाहिने हाथ में जल और अक्षत लेकर, तिथि, स्थान और होलिका दहन का उद्देश्य बोलकर जल छोड़ें।
होलिका चिता की 3, 5 या 7 बार दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) परिक्रमा करें, लोटे से निरन्तर जल की धारा डालते हुए। चिता पर कुमकुम लगाएँ और अक्षत चढ़ाएँ।
भगवान नरसिंह से रक्षा की प्रार्थना करते हुए चिता पर फूलों की माला चढ़ाएँ, प्रह्लाद की अटूट भक्ति की कथा का स्मरण करें।
नरसिंह मन्त्र
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्योर्मृत्युं नमाम्यहम्॥
शुभ प्रदोष मुहूर्त में चिता प्रज्वलित करें। जैसे-जैसे अग्नि ऊपर उठे, नरसिंह मन्त्र और होलिका दहन मन्त्र का जप करें। अग्नि अशुभ के दहन और सत्य की विजय का प्रतीक है।
होलिका दहन मन्त्र
असृक्पाभयसन्त्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः। अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव॥
पवित्र अग्नि में नई फसल के अन्न — गेहूँ, जौ, भुने चने — और साबुत नारियल अर्पित करें। ये ऋतु की पहली उपज का देवार्पण हैं।
हाथ जोड़कर भगवान नरसिंह और प्रह्लाद से प्रार्थना करें: "जैसे प्रह्लाद अपनी भक्ति से सुरक्षित रहे, वैसे ही सभी भक्तों की अशुभ से रक्षा हो।" प्रह्लाद प्रार्थना पढ़ें।
प्रह्लाद प्रार्थना
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वैष्णवज्वराय। महाज्वालाय सर्वरक्षोघ्नाय सर्वभूतरक्षोघ्नाय। सर्वज्वरघ्नाय दह दह पच पच नाशय नाशय हुं फट् स्वाहा॥
जब अग्नि शान्त हो जाए, अंगारों में नई फसल के दाने (गेहूँ की बालियाँ, जौ) भूनें। ये भुने दाने प्रसाद के रूप में परिवार और पड़ोसियों में बाँटें।
घी के दीपक से होलिका अग्नि की आरती करें। "आरती कुंज बिहारी की" गाएँ — भगवान कृष्ण की आरती, होली की दिव्य लीला का उत्सव।
उपस्थित सभी लोगों में गुजिया, मिठाई और भुने दानों का प्रसाद बाँटें। रक्षा हेतु होलिका अग्नि की पवित्र भस्म (विभूति) माथे पर लगाएँ।
अगली सुबह (धुलण्डी / रंग पंचमी): एक-दूसरे को गुलाल और प्राकृतिक रंग लगाएँ, नाचें, वृन्दावन में कृष्ण की गोपियों के साथ लीला का स्मरण करते हुए होली गीत गाएँ। पिचकारी और रंगीन पानी का प्रयोग करें।
नरसिंह मन्त्र
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्योर्मृत्युं नमाम्यहम्॥
oṃ ugraṃ vīraṃ mahāviṣṇuṃ jvalantaṃ sarvatomukham | nṛsiṃhaṃ bhīṣaṇaṃ bhadraṃ mṛtyormṛtyuṃ namāmyaham ||
मैं भगवान नरसिंह को प्रणाम करता हूँ, जो उग्र, वीर, महाविष्णु, सर्वत्र ज्वलन्त, भयंकर फिर भी मंगलकारी — मृत्यु की भी मृत्यु हैं।
11x जप संख्याहोलिका दहन मन्त्र
असृक्पाभयसन्त्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः। अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव॥
asṛkpābhayasantrastaiḥ kṛtā tvaṃ holi bāliśaiḥ | atastvaṃ pūjayiṣyāmi bhūte bhūtipradā bhava ||
हे होलिका, रक्तपान करने वाले राक्षसों से भयभीत बच्चों (भक्तों) ने तुम्हें रचा। इसलिए मैं तुम्हारी पूजा करता हूँ — हे भूत, हमें समृद्धि प्रदान करो।
प्रह्लाद प्रार्थना
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वैष्णवज्वराय। महाज्वालाय सर्वरक्षोघ्नाय सर्वभूतरक्षोघ्नाय। सर्वज्वरघ्नाय दह दह पच पच नाशय नाशय हुं फट् स्वाहा॥
oṃ namo bhagavate mahāsudarśanāya vaiṣṇavajvarāya | mahājvālāya sarvarakṣoghnāya sarvabhūtarakṣoghnāya | sarvajvaraghnāya daha daha paca paca nāśaya nāśaya huṃ phaṭ svāhā ||
महासुदर्शन (भगवान विष्णु के चक्र) को नमन, वैष्णव ज्वर, महाज्वाला, सभी राक्षसों के संहारक, सभी भूत-प्रेतों के नाशक, सभी ज्वरों के नाशक — दहन करो, पचा दो, नष्ट करो — हुं फट् स्वाहा!
नरसिंह कवच
त्रैलोक्य विजय अध्याय से शक्तिशाली रक्षा स्तोत्र। सभी अशुभ के विरुद्ध दिव्य कवच प्रदान करता है।
आरती कुंज बिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ गले में बैजन्ती माला, बजावे मुरली मधुर बाला। श्रवण में कुण्डल झलकाला, नन्द के आनन्द नन्दलाला। गगन सम अंग कान्ति काली, राधिका चमक रही आली। लतन में ठाढ़े बनमाली॥ आरती कुंज बिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ कानन में कुण्डल, मोर मुकुट पर मंद हँसे। तन छवि श्यामल, अंग विश्व में चन्दन लेपे। कस्तूरी तिलक ललार पर, सोहत आनन्द केसरी के। विजयी ब्रज में आनन्दकन्द के॥ आरती कुंज बिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ छप्पनभोग धरत नित जूठन तो ग्वालन सँग खात। अमर हों वे चरन छुवत हरि के, हस्तकमल से ग्रास उठात। उदर भरत हरि आप निछावर, गोपियन हित साँझ नचात। चरनामृत पीवत सब ही, मज्जन करत ब्रज के घात॥ आरती कुंज बिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ जहाँ ते प्रकट भई गंगा, सकल मल हरणी अंगा। स्मरण ते होत मोह भंगा, बसी मेरे हृदय में रंगा। श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की। आरती कुंज बिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ ॥ इति श्री कृष्ण आरती सम्पूर्णम् ॥
āratī kuñja bihārī kī śrī giridhara kṛṣṇa murārī kī || gale meṃ baijantī mālā, bajāve muralī madhura bālā | śravaṇa meṃ kuṇḍala jhalakālā, nanda ke ānanda nandalālā | gagana sama aṃga kānti kālī, rādhikā camaka rahī ālī | latana meṃ ṭhāḍhe banamālī || āratī kuñja bihārī kī śrī giridhara kṛṣṇa murārī kī || kānana meṃ kuṇḍala, mora mukuṭa para manda haṃse | tana chavi śyāmala, aṃga viśva meṃ candana lepe | kastūrī tilaka lalāra para, sohata ānanda kesarī ke | vijayī braja meṃ ānandakanda ke || āratī kuñja bihārī kī śrī giridhara kṛṣṇa murārī kī || chappanabhoga dharata nita jūṭhana to gvālana saṃga khāta | amara hoṃ ve carana chuvata hari ke, hastakamala se grāsa uṭhāta | udara bharata hari āpa nichāvara, gopīyana hita sāṃjha nacāta | caraṇāmṛta pīvata saba hī, majjana karata braja ke ghāta || āratī kuñja bihārī kī śrī giridhara kṛṣṇa murārī kī || jahāṃ te prakaṭa bhaī gaṃgā, sakala mala haraṇī aṃgā | smaraṇa te hota moha bhaṃgā, basī mere hṛdaya meṃ raṃgā | śrī giridhara kṛṣṇa murārī kī | āratī kuñja bihārī kī śrī giridhara kṛṣṇa murārī kī || || iti śrī kṛṣṇa āratī sampūrṇam ||
गुजिया (मीठे पकौड़े), नारियल बर्फी, भुने दाने (गेहूँ की बालियाँ, जौ, चना), दूध की मिठाइयाँ, और मौसमी फल
सभी अशुभ और नकारात्मकता का विनाश (जैसे होलिका जलाई गई), आसुरी शक्तियों से रक्षा, वातावरण की शुद्धि, अत्याचार पर भक्ति की विजय का उत्सव, और आनन्द व भाईचारे से वसन्त ऋतु का स्वागत