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गोवर्धन पूजा दिवाली के अगले दिन (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा) को की जाती है। पूजा सूर्योदय के बाद प्रातःकाल में की जाती है। अन्नकूट का भोग दोपहर से पहले लगाया जाता है।
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आँगन या पूजा स्थल में गोबर से एक छोटी पहाड़ी (गोवर्धन) बनाएँ। इसे फूलों, घास और छोटे पौधों से सजाएँ। ऊपर कृष्ण मूर्ति रखें जिनका एक हाथ उठा हो (पर्वत उठाने की मुद्रा में)।
गाय की पूजा करें — कुमकुम और हल्दी का तिलक लगाएँ, माला अर्पित करें, और ताज़ा हरा चारा एवं गुड़ खिलाएँ। गाय कामधेनु का प्रतीक है और इस पर्व में केन्द्रीय भूमिका रखती है।
दाहिने हाथ में जल और अक्षत लें। अपना नाम, गोत्र, तिथि (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा) और गोवर्धन पूजा का उद्देश्य बोलें। जल छोड़ें।
गोवर्धन पर्वत पर फूल, अक्षत, कुमकुम, धूप और दीपक अर्पित करें। फिर कृष्ण मंत्रों का जाप करते हुए गोवर्धन की 7 परिक्रमाएँ करें।
गोवर्धन धराधार गोकुलत्राणकारक। विष्णुबाहु कृतारम्भ लक्ष्मीकान्त नमोऽस्तु ते॥
govardhana dharādhāra gokulatrāṇakāraka | viṣṇubāhu kṛtārambha lakṣmīkānta namo'stu te ||
हे गोवर्धन, पृथ्वी के आधार, गोकुल के रक्षक! हे विष्णु भुजाओं वाले, लक्ष्मीकान्त — आपको नमस्कार।
56 प्रकार के भोग (छप्पन भोग) कृष्ण मूर्ति और गोवर्धन पर्वत के सामने सजाएँ। इसमें मिठाइयाँ, नमकीन, फल, मेवे, चावल, दाल, सब्ज़ियाँ और रोटियाँ शामिल हैं। भक्तिपूर्वक भोग मंत्र का पाठ करें।
घी के दीपक और कपूर से भगवान कृष्ण और गोवर्धन की आरती करें। "आरती कुंज बिहारी की" या अन्य कृष्ण भजन गाएँ। आरती करते समय घंटी बजाएँ।
अन्नकूट का प्रसाद सभी परिवारजनों और पड़ोसियों में वितरित करें। भक्तिपूर्वक भोजन बाँटना गोवर्धन पूजा के दिन प्रमुख पुण्य कर्म माना जाता है।