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महा नवमी पूजा आश्विन शुक्ल नवमी को प्रातःकाल या मध्याह्न में की जाती है। नवमी हवन प्रातःकाल में होता है और कन्या पूजा दोपहर से पहले की जाती है। सन्धि पूजा (अष्टमी-नवमी का सन्धिकाल) सबसे शुभ क्षण है।
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प्रातःकाल उठें, स्नान करें और लाल या उत्सवी वस्त्र पहनें। पूजा स्थल को साफ और सजाएँ। हवन कुण्ड (अग्निकुण्ड) तैयार करें। फूल, फल और हवन सामग्री सहित सभी सामग्री व्यवस्थित करें।
हवन कुण्ड में पवित्र अग्नि प्रज्वलित करें। दुर्गा मन्त्रों का जाप करते हुए अग्नि में घी, हवन सामग्री और तिल अर्पित करें। "ॐ दुं दुर्गायै नमः स्वाहा" के साथ 108 आहुतियाँ दें। अग्नि शुद्ध करती है और प्रार्थनाएँ देवी तक पहुँचाती है।
देवी दुर्गा की महिषासुर मर्दिनी — महिषासुर का वध करने वाली — के रूप में पूजा करें। लाल फूल, कुमकुम, लाल चुनरी और नारियल अर्पित करें। देवी को सिन्दूर लगाएँ। दुर्गा सप्तशती या महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् का पाठ करें। यह विजया दशमी से पूर्व अन्तिम युद्ध का स्मरण है।
दुर्गा के नौ रूपों का प्रतिनिधित्व करती 9 छोटी कन्याओं (2-10 वर्ष) को आमन्त्रित करें। उनके पैर धोएँ, कुमकुम तिलक लगाएँ और लाल चुनरी अर्पित करें। उन्हें हलवा, पूरी और काले चने परोसें। उपहार या दक्षिणा दें। इन कन्याओं की नवदुर्गा के जीवित अवतार के रूप में पूजा की जाती है।
ठीक उस सन्धिकाल में सन्धि पूजा करें जब अष्टमी तिथि समाप्त होती है और नवमी आरम्भ होती है। 108 मिट्टी के दीपक जलाएँ। दुर्गा को चामुण्डा रूप में — जिन्होंने चण्ड और मुण्ड का वध किया — विशेष प्रार्थना अर्पित करें। यह सम्पूर्ण नवरात्रि का सबसे शक्तिशाली क्षण है।
कपूर और घी के दीपक से दुर्गा आरती करें। फल, मिठाई और नारियल अन्तिम नैवेद्य के रूप में अर्पित करें। सभी भक्तों को प्रसाद बाँटें। विजया दशमी — बुराई पर अन्तिम विजय के दिन — की प्रतीक्षा से वातावरण भक्तिमय है।