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होलिका दहन फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि पर प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद) में किया जाता है, जब भद्रा समाप्त हो जाती है। अग्नि भद्रा काल समाप्ति के बाद ही प्रज्वलित करनी चाहिए।
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त्योहार से कुछ दिन पहले गोबर के उपले, लकड़ी के लट्ठे और सूखी सामग्री एकत्र करें। खुले सामुदायिक क्षेत्र में एक बड़ी चिता बनाएँ। बीच में प्रह्लाद के प्रतीक के रूप में एक लकड़ी का खम्भा रखें। कच्चे सूती धागे (सूतली) से चिता को लपेटें।
प्रदोष काल में चिता के पास जल का लोटा रखें। थाली में कुमकुम, अक्षत, फूल, नारियल, तिल और अन्य सामग्री सजाएँ। घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएँ। भगवान नरसिंह और प्रह्लाद का आवाहन करें।
दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें। चिता पर अक्षत और कुमकुम अर्पित करें। साबुत नारियल, तिल, नई गेहूँ की बालियाँ और भुने चने चिता के आधार पर अर्पित करें।
पूर्व दिशा से "असतो मा सद्गमय" या नरसिंह मन्त्रों का जाप करते हुए चिता प्रज्वलित करें। अग्नि समस्त बुराई के दहन का प्रतीक है। सुनिश्चित करें कि चारों ओर की सामग्री जलते समय मध्य का खम्भा (प्रह्लाद) सुरक्षित रहे।
जलती हुई चिता की 3, 5 या 7 परिक्रमाएँ (प्रदक्षिणा) दक्षिणावर्त दिशा में करें। चलते हुए लोटे से जल छिड़कें, अग्नि में तिल और अक्षत अर्पित करें, और मन्त्रों का जाप करें। समस्त नकारात्मकता के निवारण की प्रार्थना करें।
परिक्रमा के बाद भगवान नरसिंह से रक्षा की अन्तिम प्रार्थना करें। होलिका अग्नि की पवित्र भस्म (राख) माथे पर लगाएँ। भुनी हुई सामग्री और मिठाई परिवार एवं समुदाय में बाँटें। अगली सुबह रंगों का त्योहार (धुलण्डी/रंगवाली होली) है।