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चैत्र नवरात्रि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (हिन्दू नववर्ष) से शुरू होती है। घटस्थापना दिन के पहले एक-तिहाई भाग (प्रातःकाल) में, विशेषकर अभिजित मुहूर्त में करनी चाहिए। चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग से बचें।
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पूजा स्थल साफ करें। मिट्टी के बर्तन में शुद्ध मिट्टी भरकर जौ के बीज बोएँ। कलश में जल भरें, किनारे पर आम के पत्ते रखें और ऊपर लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखें। कलश को मिट्टी के ऊपर स्थापित करें। यह देवी दुर्गा का प्रतीक है।
कलश के पास अखण्ड ज्योति जलाएँ। यह दीपक नवरात्रि की सभी 9 दिन और रातों में लगातार जलता रहना चाहिए। घी या तिल के तेल का उपयोग करें।
दाहिने हाथ में जल और अक्षत लें। अपना नाम, गोत्र, तिथि (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) बताएँ और 9 दिनों तक नवदुर्गा पूजा का संकल्प करें। जल छोड़ें।
प्रतिदिन दुर्गा के विशिष्ट रूप की पूजा करें: दिन 1 — शैलपुत्री, दिन 2 — ब्रह्मचारिणी, दिन 3 — चन्द्रघण्टा, दिन 4 — कूष्माण्डा, दिन 5 — स्कन्दमाता, दिन 6 — कात्यायनी, दिन 7 — कालरात्रि, दिन 8 — महागौरी, दिन 9 — सिद्धिदात्री। निर्धारित रंग का फूल चढ़ाएँ और प्रत्येक रूप का विशिष्ट मंत्र पढ़ें।
दैनिक पूजा के बाद दुर्गा बीज मंत्र का 108 बार जप करें। यह नवरात्रि के सभी 9 दिनों का मुख्य मंत्र अभ्यास है।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
oṃ aiṃ hrīṃ klīṃ cāmuṇḍāyai vicce
ॐ, सरस्वती (ऐं), लक्ष्मी (ह्रीं) और काली (क्लीं) के बीज मंत्रों सहित, मैं चामुण्डा (दुर्गा) का आह्वान करता/करती हूँ। इस मंत्र में नवार्ण (नौ अक्षर) शक्ति का सार है।
अष्टमी या नवमी पर 9 कन्याओं (दुर्गा के 9 रूपों का प्रतिनिधित्व) को कन्या पूजन के लिए आमन्त्रित करें। उनके पैर धोएँ, तिलक लगाएँ, भोजन, मिठाई, उपहार और दक्षिणा दें। यह नवरात्रि का सबसे पवित्र कर्म है।
अन्तिम दिन नवरात्रि सामग्री से हवन (अग्नि अनुष्ठान) करें। घी, सामग्री अर्पित करें और दुर्गा मंत्र पढ़ें। हवन के बाद कलश का विसर्जन करें — सामग्री को विसर्जित करें या सम्मानपूर्वक अलग करें। अंकुरित जौ प्रसाद के रूप में बाँटें।