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केपी पद्धति ने कैसे समान भाव विभाजन को अक्षांश-संवेदी प्लेसिडस भाव-सन्धियों से प्रतिस्थापित किया ताकि ग्रह-भाव आवंटन अधिक सटीक हो
पारम्परिक वैदिक ज्योतिष (पाराशरी पद्धति) में कुण्डली को लग्न अंश से आरम्भ करते हुए ठीक 30 अंश के 12 भावों में विभक्त किया जाता है। इसे समान-भाव पद्धति कहते हैं। यदि आपका लग्न 10 अंश मेष पर है, तो प्रथम भाव 10 अंश मेष से 10 अंश वृषभ तक, द्वितीय भाव 10 अंश वृषभ से 10 अंश मिथुन तक, इत्यादि। प्रत्येक भाव ठीक 30 अंश चौड़ा है, जो प्रत्येक राशि की 30 अंश चौड़ाई को प्रतिबिम्बित करता है। यह पद्धति सरल, सुन्दर है और सहस्राब्दियों से भारतीय ज्योतिष का मानक रही है।
के.एस. कृष्णमूर्ति द्वारा 1960 के दशक में विकसित केपी (कृष्णमूर्ति पद्धति) ने एक क्रान्तिकारी परिवर्तन किया: इसने पाश्चात्य ज्योतिष से प्लेसिडस भाव पद्धति अपनाई। प्लेसिडस में भावों का आकार असमान होता है — ये प्रेक्षक के भौगोलिक अक्षांश के अनुसार भिन्न होते हैं। एक भाव 20 अंश जितना संकीर्ण या 40 अंश जितना चौड़ा हो सकता है। इस चयन का कारण सटीकता था: उच्च अक्षांशों पर (जैसे यूरोप 47 अंश उत्तर, या उत्तर भारत 28-30 अंश उत्तर पर भी), समान भाव एक ग्रह को गलत भाव में रख सकते हैं, जिससे गलत फलादेश होते हैं।
प्लेसिडस भाव पद्धति इतालवी भिक्षु और गणितज्ञ प्लेसिडस दे टिटिस (1603-1668) ने अपनी कृति "फिज़ियोमैथेमैटिका" में विकसित की। तथापि, समय-आधारित भाव विभाजन की मूल अवधारणा टॉलेमी के टेट्राबिब्लोस (द्वितीय शताब्दी ई.) तक जाती है। तमिलनाडु के प्राध्यापक के.एस. कृष्णमूर्ति ने पहचाना कि यह पाश्चात्य तकनीक भारतीय ज्योतिष की एक वास्तविक समस्या — गैर-भूमध्यरेखीय अक्षांशों पर समान भावों की अशुद्धि — का समाधान करती है, और इसे वैदिक नक्षत्र उप-स्वामी पद्धति के साथ प्रतिभापूर्वक एकीकृत कर केपी का निर्माण किया।