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संकष्टी चतुर्थी प्रत्येक माह की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को पड़ती है। मुख्य पूजा प्रदोष काल (सायं सन्ध्या) में की जाती है। उपवास केवल चन्द्र दर्शन के बाद तोड़ा जाता है।
इस पवित्र संकष्टी चतुर्थी पर, सभी विघ्नों के हर्ता श्री गणेश की पूजा और व्रत का संकल्प करता/करती हूँ — संकटों के नाश, पुण्यप्राप्ति और दिव्य कृपा के लिए।
सूर्योदय से पहले उठें, शुद्धि स्नान करें। संकष्टी चतुर्थी व्रत का संकल्प लें। उपवास सूर्योदय से शुरू होता है — आवश्यकता हो तो केवल जल और फल लें।
गणेश की मूर्ति या चित्र को स्वच्छ वेदी पर स्थापित करें। कुमकुम, अक्षत और कुछ दूर्वा अर्पित करें। अगरबत्ती और दीपक जलाएँ। यह मुख्य सायं पूजा से पहले की संक्षिप्त पूजा है।
दिन भक्ति में बिताएँ। गणेश पुराण या गणेश अथर्वशीर्ष पढ़ें। माला पर गणेश बीज मन्त्र का जप करें। पूरे दिन सात्विक और धार्मिक मनोवृत्ति बनाए रखें।
सायंकाल में पुनः स्नान करें। वेदी के सामने बैठकर दाहिने हाथ में जल और अक्षत लेकर तिथि, उद्देश्य और देवता का नाम बोलकर विधिवत् संकल्प लें।
पञ्चोपचार पूजा करें: गन्ध (लाल चन्दन), पुष्प (लाल फूल और 21 दूर्वा एक-एक करके), धूप (अगरबत्ती), दीप (घी का दीपक), और नैवेद्य (मोदक)। प्रत्येक दूर्वा "ॐ गं गणपतये नमः" बोलकर अर्पित करें।
गणेश बीज मन्त्र
ॐ गं गणपतये नमः
रुद्राक्ष या स्फटिक माला से गणेश गायत्री मन्त्र का 108 बार जप करें। इसके बाद वक्रतुण्ड महाकाय श्लोक 11 बार पढ़ें। जप के दौरान गणेश के स्वरूप पर ध्यान केन्द्रित रखें।
गणेश गायत्री मन्त्र
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥
संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा पढ़ें या सुनें। प्रत्येक माह की कथा गणेश के एक विशिष्ट स्वरूप से जुड़ी होती है। कथा में बताया जाता है कि गणेश ने कैसे भक्तों के संकट दूर किए।
कपूर और घी के दीपक से गणेश की आरती करें। "सुखकर्ता दुःखहर्ता" या "जय गणेश देवा" गाएँ। घण्टी बजाएँ और सभी परिवारजनों को ज्योति दिखाएँ।
चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करें। चन्द्रमा दिखने पर अक्षत, फूल और कुमकुम सहित चन्द्रमा को अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय "ॐ सोमाय नमः" बोलें। चन्द्रमा के दर्शन कर प्रणाम करें।
चन्द्र दर्शन और अर्घ्य के बाद पहले मोदक प्रसाद खाकर उपवास तोड़ें, फिर अन्य सात्विक भोजन लें। परिवारजनों में प्रसाद बाँटें।
गणेश बीज मन्त्र
ॐ गं गणपतये नमः
oṃ gaṃ gaṇapataye namaḥ
ॐ, सभी प्राणियों के स्वामी भगवान गणपति (गणेश) को नमस्कार।
108x जप संख्यागणेश गायत्री मन्त्र
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥
oṃ ekadantāya vidmahe vakratuṇḍāya dhīmahi | tanno dantī pracodayāt ||
ॐ, हम एकदन्त का ध्यान करते हैं, वक्रतुण्ड का चिन्तन करते हैं। दन्ती हमें प्रेरित और प्रकाशित करें।
108x जप संख्यावक्रतुण्ड महाकाय श्लोक
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
vakratuṇḍa mahākāya sūryakoṭi samaprabha | nirvighnaṃ kuru me deva sarvakāryeṣu sarvadā ||
हे वक्रतुण्ड, महाकाय, करोड़ सूर्यों के समान प्रभावाले — हे देव, मेरे सभी कार्यों को सदा निर्विघ्न कीजिए।
11x जप संख्यामोदक (भाप में पके या तले मीठे पकौड़े), लड्डू, गुड़, नारियल के टुकड़े और मौसमी फल अर्पित करें। मोदक गणेश का सर्वप्रमुख नैवेद्य है — बिना मोदक के गणेश पूजा अधूरी है।
प्रत्येक माह संकष्टी चतुर्थी व्रत का एक वर्ष तक पालन करने से गणेश की कृपा प्राप्त होती है और जीवन से सभी बाधाएँ दूर होती हैं। यह बुद्धि, समृद्धि और सभी कार्यों में सफलता प्रदान करता है। नारद पुराण के अनुसार यह व्रत सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करता है और भक्त को कभी अजेय कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता।