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भगवान कृष्ण
भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा की कारागार में मध्यरात्रि को देवकी और वसुदेव के घर हुआ। अत्याचारी कंस ने भविष्यवाणी के बाद उन्हें कैद किया था। कृष्ण के जन्म पर सभी पहरेदार सो गए, बेड़ियाँ टूट गईं।
भगवद्गीता के वक्ता परमात्मा का जन्म। कृष्ण दिव्य प्रेम, ब्रह्माण्डीय ज्ञान और कर्मयोग के प्रतीक हैं।
मध्यरात्रि तक उपवास (कृष्ण का जन्म समय)। मध्यरात्रि में भजन-कीर्तन के साथ पूजा। 56 भोग तैयार करें। बाल कृष्ण की मूर्ति को झूला झुलाएँ।
मध्यरात्रि तक कठोर व्रत। मध्यरात्रि पूजा के बाद प्रसाद से पारण।
निशीथ काल (मध्यरात्रि) सर्वाधिक शुभ समय है — भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (रोहिणी नक्षत्र) को ठीक मध्यरात्रि में हुआ था
इस पवित्र भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, भगवान कृष्ण के दिव्य जन्मदिवस पर, भक्ति की प्राप्ति, सांसारिक बन्धनों से मुक्ति और भगवान श्री कृष्ण — विष्णु के अष्टम अवतार — की परम कृपा हेतु मैं यह व्रत और पूजा करता/करती हूँ।
सूर्योदय से पूर्ण व्रत रखें। कठिन व्रती निर्जला (बिना जल) रखते हैं, अन्य फलाहार (फल, दूध, मेवे) ले सकते हैं। व्रत मध्यरात्रि पूजा के बाद तक चलता है।
पालने/झूले को फूलों, आम के पत्तों और रंगीन कपड़े से सजाएँ। अन्दर छोटा गद्दा और तकिया रखें। यह मध्यरात्रि में बालकृष्ण का पलना होगा।
कृष्ण मूर्ति, मोर पंख, बाँसुरी और प्रसाद सहित पूजा क्षेत्र सजाएँ। वेदी के पास झूला रखें। पंचामृत सामग्री, माखन-मिश्री और फल सजाएँ।
सूर्यास्त पर दीपक जलाएँ और सन्ध्या पूजा आरम्भ करें। कृष्ण को धूप और दीप अर्पित करें। भगवद्गीता या कृष्ण लीला कथाओं का पाठ शुरू करें।
रात भर जागकर (जागरण) कृष्ण भजन और कीर्तन गाएँ। लोकप्रिय गीतों में "हरे कृष्ण महामन्त्र", "गोविन्द बोलो हरि गोपाल बोलो", और कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन शामिल है।
हरे कृष्ण महामन्त्र
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
ठीक निशीथ काल (मध्यरात्रि) पर बालकृष्ण मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराएँ — पहले दूध, फिर दही, फिर घी, फिर शहद, फिर शक्कर का पानी — उसके बाद शुद्ध जल। शंख बजाएँ, घण्टी बजाएँ और "नन्द घेर आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की!" का उद्घोष करें।
अभिषेक के बाद बालकृष्ण को नए वस्त्र पहनाएँ, चन्दन का तिलक लगाएँ, मुकुट पर मोर पंख लगाएँ, और हाथ में बाँसुरी रखें। सजे हुए झूले (पालने) में धीरे से रखें।
भक्ति गीत गाते हुए पालना धीरे-धीरे झुलाएँ — बालकृष्ण के लिए लोरियाँ जैसे "सो जा राजकुमारी" या "जय जय राधा रमण"। हर परिवार के सदस्य को बारी-बारी से झूला झुलाना चाहिए।
बालकृष्ण को ताजा माखन (मक्खन) मिश्री मिलाकर अर्पित करें — उनका सबसे प्रिय भोजन। दूध, दही, फल, पंचामृत और तुलसी पत्ते भी अर्पित करें। भोग के चारों ओर जल छिड़कें।
कपूर और घी के दीपक से बालकृष्ण की आरती करें। "आरती कुंज बिहारी की" गाएँ — भगवान कृष्ण की सबसे प्रसिद्ध आरती। पूरे समय घण्टी बजाएँ और शंख फूँकें।
मध्यरात्रि पूजा, आरती और नैवेद्य के बाद, पहले पंचामृत प्रसाद, फिर माखन-मिश्री, फिर फल और अन्य सात्विक भोजन लेकर व्रत खोलें।
अगले दिन दही हांडी मनाएँ — दही, मक्खन और फलों से भरी हांडी ऊँचाई पर लटकाएँ और टीमों में तोड़ें, गोकुल में बालकृष्ण की शरारती माखन-चोरी लीलाओं का पुनर्मंचन करते हुए।
कृष्ण बीज मन्त्र
ॐ क्लीं कृष्णाय नमः
oṃ klīṃ kṛṣṇāya namaḥ
भगवान कृष्ण को नमन — क्लीं आकर्षण और दिव्य प्रेम का बीज मन्त्र (कामबीज) है
108x जप संख्याकृष्ण गायत्री मन्त्र
ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्
oṃ devakīnandanāya vidmahe vāsudevāya dhīmahi tanno kṛṣṇaḥ pracodayāt
हम देवकी नन्दन को जानते हैं, वासुदेव का ध्यान करते हैं। वह कृष्ण हमें प्रेरित करें।
गोपाल मन्त्र (द्वादशाक्षरी)
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
oṃ namo bhagavate vāsudevāya
भगवान वासुदेव (कृष्ण) को नमन — द्वादश अक्षरों का मुक्ति मन्त्र (द्वादशाक्षरी मुक्ति मन्त्र)
108x जप संख्याहरे कृष्ण महामन्त्र
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
hare kṛṣṇa hare kṛṣṇa kṛṣṇa kṛṣṇa hare hare | hare rāma hare rāma rāma rāma hare hare ||
हे हरि (कृष्ण), हे भगवान की शक्ति (हरे/राधा) — कलिसन्तरण उपनिषद् से यह 16 शब्दों का महामन्त्र कलियुग में उद्धार का सर्वोच्च साधन है
भगवद्गीता — अध्याय 4 (ज्ञान योग)
अध्याय 4 में प्रसिद्ध श्लोक "यदा यदा हि धर्मस्य..." है जहाँ कृष्ण घोषणा करते हैं कि वे जब-जब धर्म की हानि होती है तब-तब अवतार लेते हैं — जन्माष्टमी के लिए सर्वाधिक प्रासंगिक।
श्रीमद्भागवत — दशम स्कन्ध (कृष्ण जन्म)
भागवत का दशम स्कन्ध मथुरा में कृष्ण जन्म, वसुदेव का उन्हें यमुना पार ले जाना, और गोकुल-वृन्दावन में उनकी बाल लीलाओं का वर्णन करता है।
आरती कुंज बिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ गले में बैजन्ती माला, बजावे मुरली मधुर बाला। श्रवण में कुण्डल झलकाला, नन्द के आनन्द नन्दलाला। गगन सम अंग कान्ति काली, राधिका चमक रही आली। लतन में ठाढ़े बनमाली॥ आरती कुंज बिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ कानन में कुण्डल, मोर मुकुट पर मंद हँसे। तन छवि श्यामल, अंग विश्व में चन्दन लेपे। कस्तूरी तिलक ललार पर, सोहत आनन्द केसरी के। विजयी ब्रज में आनन्दकन्द के॥ आरती कुंज बिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ छप्पनभोग धरत नित जूठन तो ग्वालन सँग खात। अमर हों वे चरन छुवत हरि के, हस्तकमल से ग्रास उठात। उदर भरत हरि आप निछावर, गोपियन हित साँझ नचात। चरनामृत पीवत सब ही, मज्जन करत ब्रज के घात॥ आरती कुंज बिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ जहाँ ते प्रकट भई गंगा, सकल मल हरणी अंगा। स्मरण ते होत मोह भंगा, बसी मेरे हृदय में रंगा। श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की। आरती कुंज बिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ ॥ इति श्री कृष्ण आरती सम्पूर्णम् ॥
āratī kuñja bihārī kī śrī giridhara kṛṣṇa murārī kī || gale meṃ baijantī mālā, bajāve muralī madhura bālā | śravaṇa meṃ kuṇḍala jhalakālā, nanda ke ānanda nandalālā | gagana sama aṃga kānti kālī, rādhikā camaka rahī ālī | latana meṃ ṭhāḍhe banamālī || āratī kuñja bihārī kī śrī giridhara kṛṣṇa murārī kī || kānana meṃ kuṇḍala, mora mukuṭa para manda haṃse | tana chavi śyāmala, aṃga viśva meṃ candana lepe | kastūrī tilaka lalāra para, sohata ānanda kesarī ke | vijayī braja meṃ ānandakanda ke || āratī kuñja bihārī kī śrī giridhara kṛṣṇa murārī kī || chappanabhoga dharata nita jūṭhana to gvālana saṃga khāta | amara hoṃ ve carana chuvata hari ke, hastakamala se grāsa uṭhāta | udara bharata hari āpa nichāvara, gopīyana hita sāṃjha nacāta | caraṇāmṛta pīvata saba hī, majjana karata braja ke ghāta || āratī kuñja bihārī kī śrī giridhara kṛṣṇa murārī kī || jahāṃ te prakaṭa bhaī gaṃgā, sakala mala haraṇī aṃgā | smaraṇa te hota moha bhaṃgā, basī mere hṛdaya meṃ raṃgā | śrī giridhara kṛṣṇa murārī kī | āratī kuñja bihārī kī śrī giridhara kṛṣṇa murārī kī || || iti śrī kṛṣṇa āratī sampūrṇam ||
माखन-मिश्री (ताजा मक्खन और खड़ी शक्कर) — कृष्ण का सबसे प्रिय भोग — साथ में पंचामृत, ताजे फल, दूध, दही और तुलसी के पत्ते
भगवान कृष्ण के प्रति परम भक्ति (प्रेम भक्ति), जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति (मोक्ष), जन्मों-जन्मों के संचित पापों का नाश, गोलोक (कृष्ण का शाश्वत धाम) की प्राप्ति, और भगवान श्री कृष्ण — पूर्ण अवतार — की दिव्य कृपा