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तर्पण अमावस्या के कुतुप/मध्याह्न मुहूर्त (दोपहर का समय) में करना सर्वोत्तम है। इस समय पितृ सबसे निकट माने जाते हैं।
इस अमावस्या तिथि पर, मैं अपने दिवंगत पितृगण — पैतृक एवं मातृक — के लिए तर्पण करता/करती हूँ, उनके आशीर्वाद, उनकी आत्मा की शान्ति और पितृ दोष से मुक्ति हेतु।
प्रातःकाल स्नान करें। स्वच्छ सफ़ेद वस्त्र पहनें। सात्विक और ध्यानपूर्ण मनःस्थिति में रहें। तर्पण पूर्ण होने तक भोजन न करें।
दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। दाहिने हाथ में जल, काले तिल और कुशा घास लें। अपना गोत्र, पितृगण के नाम (पिता, पितामह, प्रपितामह; मातृपक्ष के समकक्ष), तिथि और तर्पण का उद्देश्य बोलें।
कुशा घास की दो पत्तियों से अँगूठी बनाकर दाहिने हाथ की अनामिका (रिंग फिंगर) में पहनें। यह अर्पण को शुद्ध करती है और पितृ कर्म के लिए अनिवार्य है।
दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, दाहिने हाथ के अँगूठे और तर्जनी के बीच से (पितृ तीर्थ) काले तिल मिश्रित जल अर्पित करें। पिता, पितामह और प्रपितामह — प्रत्येक के लिए तीन-तीन अंजलि दें, फिर मातृ पक्ष के पितरों के लिए। प्रत्येक अर्पण के साथ तर्पण मन्त्र का उच्चारण करें।
पितृ तर्पण मन्त्र
ॐ पिता स्वर्गतो यस्य माता यस्य दिवं गता । तस्य तिलोदकं दत्तं अक्षयं उपतिष्ठतु ॥
वैकल्पिक रूप से, पके चावल में तिल और जौ मिलाकर छोटे पिण्ड बनाएँ। दक्षिण दिशा में कुशा घास पर रखें। यह सीधे पितरों को अर्पित पोषण का प्रतीक है।
यदि सम्भव हो तो ब्राह्मण को भोजन कराएँ या किसी ज़रूरतमन्द को भोजन दें। यह दान तर्पण के पुण्य को बढ़ाता है।
पितरों के नाम पर वस्त्र, अन्न या धन दान करें। काले तिल, सफ़ेद वस्त्र और अनाज अमावस्या के पारम्परिक दान हैं।
हाथ जोड़कर पितरों से उनके आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करें। उनकी शान्ति और मुक्ति की कामना करें। कुशा पवित्री अँगूठी उतारें। अब भोजन ग्रहण कर सकते हैं।
पितृ तर्पण मन्त्र
ॐ पिता स्वर्गतो यस्य माता यस्य दिवं गता । तस्य तिलोदकं दत्तं अक्षयं उपतिष्ठतु ॥
oṃ pitā svargato yasya mātā yasya divaṃ gatā | tasya tilodakaṃ dattaṃ akṣayaṃ upatiṣṭhatu ||
ॐ, जिनके पिता स्वर्गवासी हैं, जिनकी माता स्वर्ग गई हैं, उनको दिए गए तिलोदक अक्षय हों।
पितृ गायत्री मन्त्र
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः ॥
oṃ devatābhyaḥ pitṛbhyaśca mahāyogibhya eva ca | namaḥ svadhāyai svāhāyai nityameva namo namaḥ ||
ॐ, देवताओं, पितरों और महायोगियों को नमस्कार। स्वधा (पितृ अर्पण) और स्वाहा (देव अर्पण) को सदा नमन।
तर्पण के लिए विशेष नैवेद्य नहीं। पूर्ण होने के बाद सात्विक भोजन करें। अमावस्या पर माँसाहार, प्याज़ और लहसुन से बचें।
पितरों के आशीर्वाद, पितृ दोष से मुक्ति, दिवंगत आत्माओं को शान्ति, और सन्तान कल्याण। नियमित अमावस्या तर्पण सुनिश्चित करता है कि पितृकृपा पीढ़ियों तक निर्बाध बहती रहे।