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ज्योतिष किस प्रकार स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक और दृग्बल द्वारा ग्रह शक्ति को एकल समग्र अंक में परिमाणित करता है
षड्बल (“छह शक्तियाँ”) वैदिक ज्योतिष में ग्रह की वास्तविक शक्ति को परिमाणित करने की सर्वाधिक व्यापक पद्धति है। कोई ग्रह उच्च में हो सकता है पर अस्त भी, या स्वराशि में हो पर दुःस्थान में। षड्बल छह स्वतन्त्र माप गणनाओं को जोड़कर एकल समग्र अंक (षष्ट्यंश में) देता है जो इन विरोधाभासों को सुलझाता है।
छह घटक हैं: स्थानबल (स्थिति) — 5 उप-भाग: उच्च, सप्तवर्गज, ओजा-युग्म, केन्द्रादि, द्रेक्काण। दिग्बल (दिशा) — बृहस्पति/बुध पूर्व में, सूर्य/मंगल दक्षिण में, शनि पश्चिम में, चन्द्र/शुक्र उत्तर में सबसे बलवान। कालबल (समय) — दिवस/रात्रि स्वामित्व, होरा, मास/वर्ष स्वामी। चेष्टाबल (गति) — वक्री ग्रह को अधिकतम शक्ति। नैसर्गिकबल (प्राकृतिक) — स्थिर मान, सूर्य सबसे बलवान, शनि सबसे दुर्बल। दृग्बल (दृष्टि) — शुभ दृष्टि जोड़ती है, पापी दृष्टि घटाती है। न्यूनतम प्रभावी सीमा 1.0 रूपा (60 षष्ट्यंश) है।
षड्बल का उद्गम पराशर की बृहत् पाराशर होरा शास्त्र (BPHS), अध्याय 27-30 से है, जहाँ महर्षि पराशर ने प्रत्येक बल घटक को व्यवस्थित रूप से परिभाषित किया। इस पद्धति को बाद में वराहमिहिर ने बृहत् जातक में और नीलकण्ठ ने ताजिक नीलकण्ठी में परिष्कृत किया। षड्बल की गणितीय सटीकता प्राचीन भारतीय विद्वानों की प्रायोगिक खगोलीय परम्परा को दर्शाती है।