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प्रत्येक ग्रह का एक प्राथमिक रत्न है जो उसकी ऊर्जा को प्रवर्धित करता है — परन्तु गलत रत्न धारण करना हानिकारक हो सकता है
रत्न शास्त्र ज्योतिष उपचारों की सबसे लोकप्रिय शाखाओं में से एक है। मूल सिद्धान्त सरल है: नौ ग्रहों में से प्रत्येक एक विशिष्ट रत्न से अनुनादित होता है, और उस रत्न को त्वचा के सम्पर्क में पहनने से धारक के जीवन में उस ग्रह की ऊर्जा प्रवर्धित होती है। यह केवल अलंकार नहीं है — यह जन्म कुण्डली की ग्रह गतिकी में एक जानबूझकर किया गया हस्तक्षेप है।
नौ ग्रह-रत्न सम्बन्ध हैं: सूर्य = माणिक्य (रूबी), चन्द्र = मोती (पर्ल), मंगल = मूँगा (रेड कोरल), बुध = पन्ना (एमरल्ड), गुरु = पुखराज (यलो सैफायर), शुक्र = हीरा (डायमंड), शनि = नीलम (ब्लू सैफायर), राहु = गोमेद (हेसोनाइट), और केतु = लहसुनिया (कैट्स आई)। प्रत्येक रत्न अपने ग्रह से जुड़ी ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की विशिष्ट तरंगदैर्ध्य को ग्रहण और संचारित करता है। रत्न एक एंटीना की भाँति कार्य करता है — यह ऊर्जा उत्पन्न नहीं करता बल्कि जो पहले से विद्यमान है उसे केन्द्रित और संचालित करता है।
रत्न प्राकृतिक, अनुपचारित और प्रमुख दोषों (दरारें, समावेशन, धुँधलापन) से मुक्त होना चाहिए। दोषपूर्ण रत्न बिना रत्न से भी बदतर है — यह विकृत ऊर्जा संचारित करता है। रत्न को त्वचा को स्पर्श करना चाहिए (ओपन-बैक सेटिंग) ताकि इसके कम्पन सीधे शरीर से सम्पर्क करें। कृत्रिम या प्रयोगशाला-निर्मित रत्न ज्योतिष परम्परा में प्रभावी नहीं माने जाते, क्योंकि उनमें वह प्राकृतिक क्रिस्टलीकरण प्रक्रिया नहीं होती जो ग्रहीय अनुनाद को संकेतित करती है।