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ब्रह्मगुप्त ने 628 ई. में शून्य गणित की परिभाषा कैसे दी, यह मध्ययुगीन यूरोप को क्यों डराता था, और यह आधुनिक संगणना की नींव कैसे बना
इतिहास में एक क्षण ऐसा आया जब किसी ने पूछा: क्या "कुछ नहीं" भी एक संख्या हो सकती है? यह प्रश्न इतना क्रान्तिकारी था कि इसने गणित, दर्शन और अन्ततः संगणना को हमेशा के लिए बदल दिया। 628 ई. में राजस्थान के ब्रह्मगुप्त ने इस प्रश्न का उत्तर "हाँ" में दिया और शून्य को एक पूर्ण गणितीय सत्ता बना दिया।
Addition: Any number + zero = that number. (a + 0 = a)
Subtraction: Any number − zero = that number. (a − 0 = a)
Zero minus zero: Zero minus zero = zero. (0 − 0 = 0)
Multiplication: Any number × zero = zero. (a × 0 = 0)
Zero ÷ zero: Brahmagupta claimed 0÷0 = 0 — his famous error. Modern mathematics says this is "indeterminate."
बाबुलियों (~300 BCE) के पास अपनी आधार-60 प्रणाली में रिक्त स्थान के लिए एक चिह्न था, लेकिन वे इसे कभी संख्या के रूप में नहीं मानते थे। माया सभ्यता ने भी स्वतन्त्र रूप से एक शून्य चिह्न विकसित किया। ये "प्लेसहोल्डर शून्य" थे — अंकन उपकरण, न कि संख्याएँ।
भारतीय दार्शनिक परम्परा में "शून्य" पहले से था — बौद्ध दर्शन में रिक्तता का विचार, हिन्दू दर्शन में ब्रह्म से पहले की अव्यक्त स्थिति। ब्रह्मगुप्त ने इस दार्शनिक शून्य को गणितीय शून्य बनाया।