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पिंगल ने ~200 BCE में काव्य छन्दों को द्विआधारी संकेत में कैसे एन्कोड किया — जिसे हम अब द्विआधारी अंकगणित, पास्कल त्रिभुज, और क्रमचय-संचय कहते हैं
~200 BCE में, एक भारतीय छन्दशास्त्री ने कविता को व्यवस्थित करने की कोशिश में एक ऐसा गणितीय उपकरण खोजा जो 2000 वर्ष बाद डिजिटल क्रान्ति का आधार बनेगा। पिंगल को कम्प्यूटर की आवश्यकता नहीं थी — उन्हें केवल अच्छी कविता चाहिए थी।
संस्कृत कविता में प्रत्येक अक्षर "लघु" (हल्का, छोटा) या "गुरु" (भारी, लम्बा) होता है। एक 8-अक्षर के छन्द में 2⁸ = 256 सम्भावित लय-पैटर्न हो सकते हैं। प्रश्न था: इन सभी पैटर्नों को व्यवस्थित रूप से कैसे सूचीबद्ध किया जाए?
पिंगल का उत्तर: L = 0, G = 1 के रूप में एन्कोड करें। फिर सभी 2ⁿ संयोजन द्विआधारी संख्याओं के अनुरूप हैं। उदाहरण: "LLG" = 001 (द्विआधारी) = 1 (दशमलव)। "GLG" = 101 = 5।
यह खोज आकस्मिक नहीं थी — यह एक व्यवस्थित गणितीय दृष्टिकोण था जिसे संगठित करने की आवश्यकता थी। पिंगल ने ऐसे एल्गोरिदम विकसित किए जो किसी भी n-अक्षर के छन्द के लिए सभी सम्भावित पैटर्न उत्पन्न कर सकते थे।
पिंगल का "द्विः शून्ये" ("दो बार शून्य") नियम: किसी छन्द संख्या को द्विआधारी में बदलने के लिए —
1. यदि संख्या विषम: 1 घटाएँ, "G" (गुरु=1) नोट करें
2. यदि संख्या सम: 2 से भाग दें, "L" (लघु=0) नोट करें
3. संख्या 0 होने तक दोहराएँ
4. नोट किए गए अक्षरों को उल्टे क्रम में पढ़ें = द्विआधारी प्रतिनिधित्व
यह ठीक वही एल्गोरिदम है जो आज स्कूलों में दशमलव-से-द्विआधारी रूपान्तरण के लिए पढ़ाया जाता है।