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प्रत्येकं GPS उपग्रहं, प्रत्येकं सङ्गणक-चित्रणं, प्रत्येकं सेतुः — सर्वे ज्या-फलनं उपयुञ्जते। परन्तु प्रायः कोऽपि न जानाति यत् "sine" इति संस्कृत "ज्या" शब्दात् आगतम् — 1,500 वर्षाणां भ्रान्त-अनुवाद-यात्रा या त्रिषु भाषासु त्रिषु महाद्वीपेषु च व्याप्ता।
"ज्या" अथवा "जीवा" इति शब्दस्य शाब्दिकार्थः धनुषः प्रत्यञ्चा। वृत्तं धनुषवत् कल्पयतु। तत्र एकां जीवां लिखतु — सा "ज्या"। अधुना तस्याः अर्धं "अर्धज्या" — अर्ध-प्रत्यञ्चा। एषा अर्धज्या एव अद्य sine इति कथ्यते। प्राचीनाः भारतीयाः दृश्य-स्पर्श-योग्यया ज्यामित्या एतत् फलनं परिभाषितवन्तः।
मूलं संस्कृतश्लोकः
ज्या = अर्धज्या = sin(θ)
"ज्या" = धनुषः प्रत्यञ्चा | "अर्ध" = अर्धम्
आर्यभटीये (499 CE) त्रयोविंशतिवर्षीयः प्रतिभाशाली आर्यभटः 3.75° अन्तरेण 24 ज्या-मूल्यानि दत्तवान्, 3.75° तः 90° पर्यन्तम्। सः तान् 225-आधार-पद्धत्या एकस्मिन् सङ्क्षिप्त-स्मृति-श्लोके एन्कोड् कृतवान् — 3-4 दशमलव-स्थानेषु सम्यक्।
शास्त्रीयस्रोतः
आर्यभटीय, गणितपाद, श्लोक १२
मखि भखि फखि धखि नखि नखि मखि फखि...
मूलस्रोतः: आर्यभटीयम्, गणितपादः, श्लोकः 12 — "मखि भखि फखि धखि नखि नखि..." — सर्वेषां 24 ज्या-अन्तराणां ध्वन्यात्मक-कूटम्।
| कोणः | आर्यभटः (499 CE) | आधुनिकमानम् | त्रुटिः |
|---|---|---|---|
| 3.75° | 225 | 224.86 | 0.06% |
| 7.50° | 449 | 448.75 | 0.05% |
| 11.25° | 671 | 670.72 | 0.04% |
| 15.00° | 890 | 889.82 | 0.02% |
| 18.75° | 1105 | 1105.1 | 0.01% |
| 22.50° | 1315 | 1315.6 | 0.05% |
| 30.00° | 1719 | 1719.0 | 0.00% |
| 45.00° | 2431 | 2431.1 | 0.00% |
| 60.00° | 3438 | 3437.7 | 0.01% |
| 90.00° | 3438 | 3437.7 | 0.01% |
* मानानि R=3438 (चापकलायाः त्रिज्यायाः) मापदण्डे
यदा अरब-गणितज्ञाः भारतीय-ग्रन्थान् अनूदितवन्तः (~800 CE), ते "जीवा" इति "जिबा" इति ध्वन्यात्मकतया लिप्यन्तरितवन्तः। यतः अरबी भाषा स्वर-रहिता लिख्यते, "जिबा" इति पश्चात् "जैब" इति भ्रान्ततया पठितम् — अरबी शब्दः यस्यार्थः "कोशः, स्यूतम्"। तदनन्तरं लैटिन-अनुवादकः "Sinus" इति कृतवान्। गणितं सर्वदा भारतीयम् एव आसीत्।
⚡ वह क्षण जब "जिबा" को गलती से "जैब" (जेब) पढ़ा गया — यह एक अनुचित स्वर जोड़ने की त्रुटि थी, जो अरबी लिपि की एक सीमा है। इस एक पढ़ने की गलती ने "sine" का नाम बदल दिया, लेकिन गणित वही रहा।
आर्यभटस्य मूल्यानि, 499 CE वर्षे गणितानि, आधुनिक-IEEE-754-मानैः सह उल्लेखनीयतया सम्यक् सन्ति। सर्वाधिकं विचलनं 0.2% अधः अस्ति।
आर्यभटः ज्यायां न अतिष्ठत्। सः पूर्णां पद्धतिं परिभाषितवान्: कोज्या — पूरक-ज्या। उत्क्रमज्या — विपरीत-ज्या। ब्रह्मगुप्तः (628 CE) पश्चात् मध्यवर्ती-कोणेषु ज्या-गणनार्थं प्रक्षेप-सूत्राणि योजितवान्।
अस्मिन् ऐप् मध्ये प्रत्येका गणना आर्यभटस्य त्रिकोणमित्या सह सम्बद्धा। ग्रह-देशान्तराः गोलाकार-क्रान्तिवृत्त-निर्देशाङ्कानां मध्ये रूपान्तरणार्थं ज्या-कोज्ययोः उपयोगं कुर्वन्ति। यदा भवान् अद्यतनं पञ्चाङ्गं पश्यति, तदा आर्यभटस्य गणितम् वास्तविक-समये दृश्यते।
गणितं सर्वदा भारतीयमेव आसीत्। केवलं नाम एव नष्टम् अभवत्।