पुरी · Odisha
महाशिवरात्रि 2028पुरी मे
Exact puja times & muhurta computed for Puri coordinates (19.81°N, 85.83°E)
मुख्य समय
पर्वक तिथि
Wednesday, February 23, 2028
Nishita Kaal Puja
23:34 – 00:24
सूर्योदय
06:11
सूर्यास्त
17:49
ई तिथि किएक?
निशिता काल (मध्यरात्रि) नियम: ओहि दिन मनाओल जाइत अछि जखन निशिता काल (रातिक आठम मुहूर्त, लगभग ११:४० राति सँ १२:२८ भोर धरि) मे चतुर्दशी तिथि रहैत अछि। शिव मध्यरात्रि मे प्रकट भेलाह, एहि कारण ई पवित्र अवलोकन काल अछि।
तिथि निर्धारणक नियम
The tithi must prevail during Nishita Kaal (midnight). Used for festivals like Maha Shivaratri and Janmashtami.
Source: Dharmasindhu & Nirnayasindhu – classical Kala-Vyapti system
पूजा विधि
पूजाक चरण
- 1
व्रत सङ्कल्प आ तैयारी
भोर सँ उपवास शुरू करू। स्नान करू, स्वच्छ वस्त्र धारण करू, आ शिवलिंगक लग शिवरात्री व्रतक लेल औपचारिक सङ्कल्प करू।
- 2
आचमन ओ प्राणायाम
शुद्धिकरणक लेल आचमन (जलपान) करू, तत्पश्चात् मनकेँ शान्त करबाक लेल तीन बेर प्राणायाम (श्वास नियन्त्रण) करू।
- 3
ध्यान (शिव पर ध्यान)
भगवान शिव पर ध्यान करू – त्रिनेत्रधारी, चन्द्रशेखर, नीलकण्ठ, त्रिशूल, डमरू ओ वरद मुद्रा धारण कएने, नन्दीक संग कैलाश पर्व...
व्रत फल (व्रतक लाभ)
मोक्ष (जन्म-मृत्यु चक्र सँ मुक्ति), संचित पापक पूर्ण विनाश (पाप नाशन), शिवक प्रत्यक्ष कृपा आ दर्शन, सभटा धार्मिक इच्छाक पूर्ति, आ आध्यात्मिक जागरण
गणनाक प्रमाण – पारदर्शी लेखा परीक्षण
देवता
भगवान शिव
कथा आ इतिहास
महाशिवरात्रि — फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी कें महान रात्रि — सँ अनेक पुराण शिव कें विविध लीला जोड़ैत अछि। पूरा कथा पढू →कम देखाबू ↑
महाशिवरात्रि — फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी कें महान रात्रि — सँ अनेक पुराण शिव कें विविध लीला जोड़ैत अछि।
शिव पुराण कें केन्द्र मे शिव-पार्वती विवाह अछि। दक्ष यज्ञ कें अग्नि मे सती कें देहत्याग कें बाद शिव कैलास पर दीर्घ तपस्या मे लीन भय गेलाह। पर्वतराज कें पुत्री पार्वती ओकरे समान कठोर तपस्या कयलनि — ऋतु पर्यन्त उपवास, एक पाद स्थित, गिरल पात कें भोजन, अन्त मे पात कें सेहो त्याग (अपर्णा)। देवता, यह जानि कय जे तारकासुर कें वध केवल शिव-पुत्र कय सकैत छथि, कामदेव कें तप-भङ्ग कें लेल पठयलनि — आ काम भस्म भेल। पार्वती कें तपस्या तखन तक चलल जखन तक शिव स्वयं द्रवित नहि भय गेलाह; ओ पर्वत सँ उतरि कय हुनका वर रूप मे स्वीकार कयलनि, आ फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी कें मध्य रात्रि मे ब्रह्मा कें पौरोहित्य मे दिव्य विवाह सम्पन्न भेल। भक्त कें रात-जागरण ओही वर-प्रतीक्षा कें पुनरावृत्ति अछि।
दोसर कथा समुद्र मन्थन कें अछि। क्षीर-सागर मन्थन मे सबसँ पहिने अमृत नहि, हलाहल विष प्रकट भेल — एहन प्रबल जे एक बूँद सँ लोक नष्ट भय जाय। देवता शिव कें शरण मे गेलाह; शिव विष कें कण्ठ मे धारण कयलनि, आ पार्वती हुनकर कण्ठ दबा कय रखलनि। कण्ठ नील भय गेल, ओ नीलकण्ठ कहाओल। चारि प्रहर कें अभिषेक ओही उपकार कें प्रत्युपकार अछि।
तेसर परम्परा — काश्मीर शैव दर्शन कें — ओही रात्रि अछि जखन शिव अनन्त ज्योतिर्लिङ्ग रूप मे पहिल बेर प्रकट भेल। ब्रह्मा-विष्णु ओकर अन्त नहि पाबि सकलाह। प्रत्येक शिवलिङ्ग ओही अप्रमेय अग्नि-स्तम्भ अछि।
चौथा, मधुर कथा एक व्याध कें अछि जे ओही रात्रि वन मे रास्ता हरा बैसल। बिल्व-वृक्ष पर चढ़ि कय जागल रहय कें लेल रात भर पात तोड़ि कय नीचा गिरबैत रहल — जे अनजान मे मूल मे स्थित शिवलिङ्ग पर गिरैत रहल। ओकर अनैच्छिक रात्रि-जागरण आ अनिच्छित अर्पण ओकरा मोक्ष देलक।
कनाय पालन करब
कठोर उपवास रखें (निर्जला या फलाहार)। रात भर जागें (जागरण)। चार प्रहरों में शिवलिंग पर बेलपत्र, दूध, जल और शहद चढ़ाएँ। "ओम नमः शिवाय" का जाप करें।
महत्व
वर्ष की सबसे अन्धकारमय रात्रि – अन्धकार और अज्ञान पर विजय का प्रतीक। इस रात्रि शिव की ऊर्जा सर्वाधिक सुलभ मानी जाती है।
व्रत
कठोर व्रत (निर्जला या केवल फलाहार)। अगली सुबह पूजा के बाद पारण करें।